Tuesday, July 8, 2014

Aab Ki Bar Modi Sarkar



ये सुनते ही मेरे पाँव जैसे पत्थर के बन गए और जुबान को अधरंग हो

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 Aab Ki Bar Modi Sarkar,

〰वो जूतों की दुकान के बाहर खड़ा हुआ बार
बार अपनी जेब में हाथ डालता और फिर
निकाल लेता। हर बार हाथ डालने के बाद
उसकी आँखों की मायूसी बढ़ती जा रही थी। आख़िरकार भारी मन से वो आगे की और चल
पड़ा पर कुछ मिनटों के बाद ही वापिस आ
गया। काफी भारी क़दमों से दुकान के अन्दर
घुसा। मैं काउंटर के पास ही अपनी बीवी की शौपिंग
पूरी होने का इंतज़ार कर रहा था और टाइम पास
करने के लिए बाहर सड़क की चहल पहल देख
रहा था जब मेरी नज़र उसपर पड़ी। जैसे ही वो अन्दर आया तो मेरी तन्द्रा टूटी।
बहुत ही दबी सी आवाज़ में काउंटर के पीछे खड़े
लड़के को बोला
"ये काले वाले स्कूल के जूते कितने के हैं?"
लड़के ने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा "380
रुपये" "जी ठीक है। मैं बाद में आता हूँ" इतना कहकर
ही वो भारी गर्दन और भारी क़दमों के साथ
दूकान से बाहर निकल गया। फिर बाहर जा कर
दोबारा जेब में हाथ डाला और कुछ सोचने लगा। मेरी जिज्ञासा बढ़ी, मैं भी उसके पीछे पीछे
बाहर आ गया। पहले तो मैं झिझका पर फिर
मैंने उस से पूछ ही लिया "क्या हुआ
भैया क्या प्रॉब्लम है?" "कुछ नहीं भैया। कुछ नहीं । मेरी बेटी है सात
साल की। उसके लिए स्कूल के जूते लेने थे।
वोही ढूंढ रहा था" कह कर उसने गर्दन सड़क
की तरफ घुमा ली।
मुझे अफ़सोस हुआ के मैंने उसका दिल
दुखा दिया और मन किया के मैं उसे उसके हाल पर छोड़ दूं पर मैं वहां से हिल नहीं पाया। "क्या हुआ? पसंद नहीं आये? " मैने पूछा "नहीं ऐसी बात नहीं है। जूते तो बहोत अच्छे
हैं। मेरी बेटी ने ऐसे ही जूते कहे थे लानेको।
 

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http://multi-tasking-banana.blogspot.com/2014/07/aab-ki-bar-modi-sarkar.html


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 Aab Ki Bar Modi Sarkar,
〰वो जूतों की दुकान के बाहर खड़ा हुआ बार
बार अपनी जेब में हाथ डालता और फिर
निकाल लेता। हर बार हाथ डालने के बाद
उसकी आँखों की मायूसी बढ़ती जा रही थी। आख़िरकार भारी मन से वो आगे की और चल
पड़ा पर कुछ मिनटों के बाद ही वापिस आ
गया। काफी भारी क़दमों से दुकान के अन्दर
घुसा। मैं काउंटर के पास ही अपनी बीवी की शौपिंग
पूरी होने का इंतज़ार कर रहा था और टाइम पास
करने के लिए बाहर सड़क की चहल पहल देख
रहा था जब मेरी नज़र उसपर पड़ी। जैसे ही वो अन्दर आया तो मेरी तन्द्रा टूटी।
बहुत ही दबी सी आवाज़ में काउंटर के पीछे खड़े
लड़के को बोला
"ये काले वाले स्कूल के जूते कितने के हैं?"
लड़के ने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा "380
रुपये" "जी ठीक है। मैं बाद में आता हूँ" इतना कहकर
ही वो भारी गर्दन और भारी क़दमों के साथ
दूकान से बाहर निकल गया। फिर बाहर जा कर
दोबारा जेब में हाथ डाला और कुछ सोचने लगा। मेरी जिज्ञासा बढ़ी, मैं भी उसके पीछे पीछे
बाहर आ गया। पहले तो मैं झिझका पर फिर
मैंने उस से पूछ ही लिया "क्या हुआ
भैया क्या प्रॉब्लम है?" "कुछ नहीं भैया। कुछ नहीं । मेरी बेटी है सात
साल की। उसके लिए स्कूल के जूते लेने थे।
वोही ढूंढ रहा था" कह कर उसने गर्दन सड़क
की तरफ घुमा ली।
मुझे अफ़सोस हुआ के मैंने उसका दिल
दुखा दिया और मन किया के मैं उसे उसके हाल पर छोड़ दूं पर मैं वहां से हिल नहीं पाया। "क्या हुआ? पसंद नहीं आये? " मैने पूछा "नहीं ऐसी बात नहीं है। जूते तो बहोत अच्छे
हैं। मेरी बेटी ने ऐसे ही जूते कहे थे लानेको।
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http://multi-tasking-banana.blogspot.com/2014/07/aab-ki-bar-modi-sarkar.html
काफी दिनों से टूटे हुए जूते डाल कर स्कूल
जा रही है। रोज कहती है के ऐसे वाले जूते लेकर
आना। आज मिल गए।" अचानक
उसका गला भारी हो गया "तो फिर लिये क्यों नहीं?"
मेरी जिज्ञासा बढ़ी उसकी आवाज से ऐसे लगा जैसे रोने
ही वाला हो "एक हफ्ता पहले ही तनख्वाह
मिली थी। इस बार सब्जी, राशन,
बिजली सब महंगी हो गयी है। मकानमालिक
ने भी किराया बढ़ा दिया है। दूध का और
बनिए का हिसाब करना अभी बाकी है। कहते हैं के महंगाई बढ़ गयी है इसीलिए नए रेट से पैसे
लेंगे। सबको देने के बाद मेरे पास जो पैसे बचेंगे
उस से या तो अपनी बेटी को जूते
दिलवा सकता हूँ या गाँव में इंतज़ार कर रहे बूढ़े
माँ बाप को रोटी। यही सोच रहा हूँ के
किसकी जरुरत ज्यादा जरुरी है।" थोड़ी देर रुका, गला साफ़ किया औरफिर हलके
से बोला "बड़ी उम्मीद थी के नयी सरकार
आएगी तो महंगाई कम होगी, तो इस बार माँ के
लिए खर्चे के साथ साथ एक चश्मा भी भेजूंगा।
पिछले महीने टूट गया था। लेकिन
नयी सरकार आनेके बाद तो ये सोच रहा हूँ के रोटी कैसे खिलाऊ" 〰ये सुनते ही मेरे पाँव जैसे पत्थर के बन गए और
जुबान को अधरंग हो


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